दो बैलों की कथा (Do Bailon Ki Katha) - मुंशी प्रेमचंद

श्रेणी: मुंशी प्रेमचंद क्लासिक | लेखक/बोर्ड: मुंशी प्रेमचंद (1880-1936)

संक्षिप्त सारांश:

झूरी काछी के दो स्वाभिमानी बैलों—हीरा और मोती की अटूट मित्रता, पराधीनता के विरुद्ध संघर्ष, कांजीहौस से साहसिक पलायन और स्वाभिमान की अमर प्रेरक कहानी।

भाग 1: हीरा और मोती का भाईचारा और झूरी का नेह

जानवरों में गधा सबसे ज्यादा बुद्धिहीन समझा जाता है। हम जब किसी आदमी को परले दरजे का बेवकूफ कहना चाहते हैं, तो उसे गधा कहते हैं। गधा सचमुच बेवकूफ है या उसके सीधेपन, उसकी निरापद सहिष्णुता ने उसे यह पदवी दे दी है, इसका निश्चय नहीं किया जा सकता। गायें सींग मारती हैं, ब्याही हुई गाय तो अनायास ही सिंहनी का रूप धारण कर लेती है। कुत्ता भी बहुत गरीब जानवर है, लेकिन कभी-कभी उसे भी क्रोध आ ही जाता है; किंतु गधे को कभी क्रोध करते नहीं सुना, न देखा। जितना चाहो गरीब को मारो, चाहे जैसी खराब, सड़ी हुई घास सामने डाल दो, उसके चेहरे पर कभी असंतोष की छाया भी न दिखाई देगी।

गधे का एक छोटा भाई और भी है, जो उससे कम ही गधा है, और वह है ‘बैल’। जिस अर्थ में हम ‘गधा’ का प्रयोग करते हैं, कुछ उसी से मिलते-जुलते अर्थ में ‘बछिया के ताऊ’ का भी प्रयोग करते हैं।

झूरी काछी के दोनों बैलों के नाम थे—हीरा और मोती। दोनों पछाईं जाति के थे—देखने में सुंदर, काम में चौकस, डील में ऊंचे। बहुत दिनों साथ रहते-रहते दोनों में भाईचारा हो गया था। दोनों आमने-सामने या आस-पास बैठे हुए एक-दूसरे से मूक भाषा में विचार-विनिमय करते थे। एक-दूसरे के मन की बात कैसे समझ जाता था, हम नहीं कह सकते। अवश्य ही उनमें कोई ऐसी गुप्त शक्ति थी, जिससे जीवों में श्रेष्ठता का दावा करने वाला मनुष्य वंचित है। दोनों एक-दूसरे को चाटकर और सूंघकर अपना प्रेम प्रकट करते, कभी-कभी दोनों सींग भी मिला लिया करते थे—विग्रह के नाते से नहीं, केवल विनोद के भाव से, आत्मीयता के भाव से।

भाग 2: ससुराल में अपमान, विद्रोह और नन्हीं बालिका का वात्सल्य

एक बार झूरी ने दोनों बैलों को अपने ससुराल ‘गया’ के घर भेज दिया। बैलों को क्या मालूम, वे क्यों भेजे जा रहे हैं! उन्होंने समझा, मालिक ने हमें बेच दिया। अपना यूं बेचा जाना उन्हें अच्छा लगा या बुरा, कौन जाने; पर झूरी के साले गया को घर तक गोईं ले जाने में दांतों पसीना आ गया। पीछे से हांकता तो दोनों दाएं-बाएं भागते, पगहिया पकड़कर आगे से खींचता तो दोनों पीछे को जोर लगाते। अगर ईश्वर ने उन्हें वाणी दी होती, तो झूरी से पूछते—"तुम हम गरीबों को क्यों निकाल रहे हो? हमने तो तुम्हारी सेवा करने में कोई कसर नहीं उठा रखी। अगर इतनी मेहनत से काम न चलता था, तो और काम ले लेते। हम तो तुम्हारी चाकरी में मर जाने को तैयार थे।"

रात को जब दोनों को नाद में बांधा गया, तो उन्होंने निश्चय किया कि यहां नहीं रहना। रात को दोनों ने जोर मारकर पगहे तोड़ डाले और सुबह झूरी के चरनी पर आ खड़े हुए। झूरी उन्हें देखकर गद्गद हो गया और दौड़कर गले लगा लिया। गांव के लड़के जमा हो गए और तालियां बजा-बजाकर उनका स्वागत करने लगे।

लेकिन अगले दिन गया फिर आया और दोनों को गाड़ी में जोतकर ले गया। इस बार उसने बड़ी क्रूरता बरती। दोनों से दिन-भर खेत में बेगार कराई, मोटी लाठियों से पीटा और खाने को केवल सूखा भूसा दिया। अपने बैलों को खली, चूनी सब कुछ दी। मोती का खून खौल उठा। उसने हीरा से कहा—"अब तो मुझसे नहीं सहा जाता।"

उस घर में एक नन्हीं अनाथ बालिका रहती थी, जिसकी मां मर चुकी थी और सौतेली मां उसे मारती थी। बालिका को इन मूक पशुओं से एक प्रकार की आत्मीयता हो गई थी। वह रात को चुपके से दोनों को दो रोटियां खिला जाती। उस एक रोटी से इनकी भूख तो क्या शांत होती, पर दोनों के हृदय को मानो भोजन मिल जाता था। एक रात बालिका ने आकर दोनों के गले की रस्सी खोल दी और बोली—"जल्दी भागो, नहीं तो ये लोग तुम्हें बहुत मारेंगे।" दोनों बैल सरपट भाग निकले।

भाग 3: मतवाले सांड़ से युद्ध और कांजीहौस का विध्वंस

भागते-भागते दोनों नए रास्ते पर निकल आए। भूख लगी तो एक मटर के खेत में घुसकर चरने लगे। पेट भर गया तो मस्ती में आकर डकारने और एक-दूसरे से सींग मिलाने लगे।

सहसा सामने से एक विशालकाय, मतवाला सांड़ चला आ रहा था। दोनों मित्रों की जान सूख गई। सांड़ से लड़ना मौत को दावत देना था, परंतु भागे तो भी सांड़ पीछा करके मार डालेगा। हीरा ने कहा—"दोनों मिलकर वार करते हैं। जब वह मुझ पर झपटे, तुम पीछे से उसके पेट में सींग घुसेड़ देना।"

सांड़ ज्यों ही हीरा पर लपका, मोती ने पीछे से हमला किया। सांड़ घूमा तो हीरा ने आगे से सींग मारा। सांड़ घबरा गया। वह तो एक शत्रु से लड़ने का आदी था, यहां दो संगठित योद्धा थे। अंत में घायल और लहुलुहान होकर सांड़ उल्टे पांव भाग खड़ा हुआ। दोनों मित्रों ने विजय का आनंद मनाया।

आगे चलकर मोती फिर मटर के खेत में घुस गया। हीरा ने मना किया, पर वह न माना। इतने में रखवाले लाठियां लेकर आ पहुंचे। हीरा तो मेड़ पर था, निकल गया; मोती के खुर गीली मिट्टी में धंस गए। अपने मित्र को फंसा देखकर हीरा भी वापस आ गया। दोनों पकड़ लिए गए और उन्हें कांजीहौस (मवेशीखाना) में बंद कर दिया गया।

कांजीहौस में कई गधे, बकरियां और घोड़ियां बंद थीं। सब मुर्दों की तरह पड़े थे। दिन-भर में पानी की एक बूंद भी न मिली। रात को मोती ने हीरा से कहा—"अब नहीं रहा जाता।" मोती ने अपने नुकीले सींगों से कच्ची दीवार पर प्रहार करना शुरू किया। मिट्टी का एक ढेला गिरा तो उसका उत्साह बढ़ गया। उसने पूरी ताकत से टक्कर मारी और आधी दीवार गिरा दी। दीवार गिरते ही घोड़ियां, बकरियां और गधे भागकर आजाद हो गए। परंतु हीरा की रस्सी बहुत मजबूत थी, वह न भाग सका। मोती ने हीरा को अकेला छोड़कर भागने से साफ इनकार कर दिया और वहीं भूखा-प्यासा उसके पास बैठ गया। सुबह चौकीदार ने आकर मोती को खूब पीटा और भारी रस्सी से बांध दिया।

भाग 4: कसाई की नीलामी और स्वाभिमान से घर वापसी

एक सप्ताह तक दोनों मित्र वहां भूखे-प्यासे पड़े रहे। अंत में एक दिन उन्हें दढ़ियल कसाई के हाथ नीलाम कर दिया गया। कसाई दोनों को रस्सियों से बांधकर ले चला। दोनों डर से कांप रहे थे। उनके शरीर में मांस न बचा था, हड्डियां निकल आई थीं।

चलते-चलते अचानक उन्हें मार्ग परिचित लगने लगा। यह वही रास्ता था जो झूरी के गांव को जाता था! वही खेत, वही कुआं, वही बाग! दोनों की सारी थकान और दुर्बलता क्षण भर में गायब हो गई। उनमें नई ऊर्जा का संचार हो गया।

दोनों ने एक साथ पूरी ताकत से रस्सियां छुड़ा लीं और सरपट दौड़ पड़े। कसाई चिल्लाता रह गया, लेकिन दोनों ने पीछे मुड़कर न देखा। वे सीधे झूरी के द्वार पर आकर अपनी पुरानी चरनी के सामने खड़े हो गए।

झूरी द्वार पर बैठा धूप सेंक रहा था। बैलों को देखते ही वह उठा और दोनों को गले से लगा लिया। उसकी आंखों से खुशी के आंसू बहने लगे। कसाई ने आकर बैलों की रस्सियां पकड़ लीं और कहा—"ये बैल मेरे हैं, मैंने इन्हें नीलामी में खरीदा है।" मोती ने आव देखा न ताव, सींग तानकर कसाई पर झपटा। कसाई पीछे हटा। मोती ने खदेड़ा। कसाई गांव की सीमा से बाहर भाग खड़ा हुआ।

झूरी ने दोनों की नादों में खली, चूनी, भूसा और दाना भर दिया। दोनों बड़े चाव से खाने लगे। झूरी की पत्नी ने भी आकर दोनों के माथे चूम लिए। पूरे गांव में हर्ष की लहर दौड़ गई।

🌟 सीख: स्वतंत्रता अमूल्य है, जिसके लिए निरंतर संघर्ष और स्वाभिमान आवश्यक है। सच्ची मित्रता संकट की घड़ी में त्याग और निष्ठा से प्रमाणित होती है।